भगवान हमारे आराध्य हैं मनोरंजन का साधन नहीं अजय गुप्ता

हमारे लिए भगवान केवल कोई पात्र या मंच का चरित्र नहीं हैं। वे हमारी आस्था हैं, हमारे संस्कार हैं, हमारी चेतना का आधार हैं।

कभी-कभी मन में एक प्रश्न उठता है क्या हमने अपने उत्सवों की खुशी में अपने आराध्यों के प्रति अपनी मर्यादा को कहीं पीछे तो नहीं छोड़ दिया?

आजकल शादी-विवाह, धार्मिक आयोजनों, झांकियों और अन्य शुभ अवसरों पर भगवान श्रीराम-सीता, राधा-कृष्ण और भगवान शिव के स्वरूप में कलाकारों को नचाकर मनोरंजन करने की परंपरा बढ़ती दिखाई देती है। इसे देखकर अंतर्मन सहज नहीं होता। प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष का नहीं है, प्रश्न उस भावना का है जिसके साथ हम अपने आराध्यों को देखते और पूजते आए हैं।

हमारे लिए भगवान केवल कोई पात्र या मंच का चरित्र नहीं हैं। वे हमारी आस्था हैं, हमारे संस्कार हैं, हमारी चेतना का आधार हैं। श्रीराम हमारे लिए मर्यादा के प्रतीक हैं, श्रीकृष्ण जीवन के गहरे दर्शन का संदेश देते हैं और भगवान शिव त्याग, तप और वैराग्य की अनुभूति कराते हैं।

फिर क्या यह उचित है कि जिन स्वरूपों के सामने हम सिर झुकाते हैं, उन्हीं स्वरूपों को केवल मनोरंजन का माध्यम बना दें?

खुशी मनाना हमारी संस्कृति का हिस्सा है। विवाह उत्सव है, धार्मिक आयोजन आनंद का अवसर है और झांकियां हमारी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति हैं। लेकिन आनंद के बीच भी मर्यादा का होना आवश्यक है। हमारी संस्कृति ने हमें यही सिखाया है कि उत्सव जितना बड़ा हो, भीतर की श्रद्धा उससे बड़ी होनी चाहिए।

मेरा उद्देश्य किसी की भावना को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि अपने ही अंतर्मन से एक प्रश्न करना है क्या भगवान को मंच पर नचाने से हमारी भक्ति बढ़ती है? या फिर आवश्यकता इस बात की है कि भगवान के आदर्श हमारे आचरण में दिखाई दें?

यदि हम श्रीराम को अपना आराध्य मानते हैं तो उनके जीवन की मर्यादा हमारे व्यवहार में दिखाई दे। यदि कृष्ण हमारे आराध्य हैं तो उनके कर्म और जीवन-दर्शन को समझने का प्रयास हो। यदि शिव हमारे आराध्य हैं तो उनके त्याग और तप की भावना हमारे जीवन में उतरने का प्रयास हो।

भगवान को मनोरंजन का पात्र बनाने के बजाय उन्हें अपने हृदय में स्थान देना शायद हमारी आस्था के प्रति अधिक सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

यह विषय केवल धार्मिक भावना तक सीमित नहीं है। यह हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी से भी जुड़ा है। इसलिए सरकार और समाज दोनों को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। ऐसे उचित नियम बनाए जा सकते हैं, जिनसे धार्मिक प्रतीकों, पूजनीय स्वरूपों और आस्था से जुड़े चिन्हों के जानबूझकर किए जाने वाले उपहास, अशोभनीय प्रदर्शन या अनुचित मनोरंजक उपयोग को रोका जा सके।

लेकिन नियम बनाते समय विवेक भी उतना ही आवश्यक है। सच्ची धार्मिक झांकी, पूजा, भक्ति, सांस्कृतिक कार्यक्रम और परंपरागत प्रस्तुतियां हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं। उद्देश्य उन पर रोक लगाना नहीं, बल्कि आस्था और मनोरंजन के बीच की उस मर्यादा को सुरक्षित रखना होना चाहिए, जिसे पार करने पर किसी की धार्मिक भावना आहत हो सकती है।

अंततः बात कानून से कहीं बड़ी है बात हमारे संस्कारों की है। कानून हमें रोक सकता है, लेकिन मर्यादा हमें भीतर से रोकती है। इसलिए परिवर्तन बाहर से नहीं, हमारे अंतर्मन से शुरू होना चाहिए।

आइए, हम अपने उत्सवों को और अधिक सुंदर बनाएं, लेकिन अपनी आस्था की कीमत पर नहीं। भगवान हमारे उत्सव की सजावट नहीं हैं। वे हमारे जीवन के संस्कार हैं।

शायद सच्ची भक्ति यही है कि भगवान को मंच पर नचाने के बजाय, उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारा जाए।