एक संत ने कहा कि 100 मे एक सिद्ध होता है ; जानिए सिद्ध संत और जीवन का प्रारब्ध

सोचा क्या ? हुआ क्या ? यही है जीवन ! मेरी जिंदगी का प्लान क्या था ? आपने भी सोचा होगा कि यह बनना है और आप मे से कुछ लोग बन गए होंगे और बहुत से लोग नही भी बन पाए होंगे तब यक्ष प्रश्न आता है कि जिंदगी चाहती क्या है ?
मैने कभी नही सोचा था कि जंगल के संतो की तरफ जाऊंगा अगर मैने कुछ सोचा था तो वह घर परिवार के माहौल के अनुकूल राजनीति के लिए सोचा था और एक खास पद जिसका उल्लेख नही करूंगा लेकिन यह इच्छा थी कि कम से कम इतना तो बनना है फिर आगे देखा जाएगा।
किन्तु कोई एक घटना जिंदगी बदलकर रख देती है और ऐसा ही हुआ ; कुछ ऐसा हुआ कि दुनियाभर की नजर मे खिला हुआ मुस्कुराता हुआ पुष्प किस पल झर जाएगा यह खुद उस पुष्प को नही पता रहता !
यही वो मोड है जीवन का जो प्रारब्ध वश जीवन को किसी और मंजिल की ओर ले जाता है जैसे मैं अचानक से चित्रकूट जंगल की यात्रा करने लगा और संत दर्शन करने लगा।

प्रकृति की परछाईं मे सुख मिलने लगा और संतो से दिव्य ज्ञान मिलने लगा। शास्त्र की बातें निजी अनुभव मे उतरने लगीं इसलिए बहुत कुछ याद हो गया।
हर स्थान की अपनी एक विशेष ऊर्जा है जैसे चित्रकूट जंगल मे देवरहा बाबा की मचान आश्रम मे बिना चप्पल जूते के कदम रखते ही सिर्फ एक शब्द निकला अरे यहाँ कुछ तो बात है ; कदम रखते ही एक अलग ही ऊर्जा महसूस हो रही है।
एक संत ने कहा कि 100 मे एक सिद्ध होता है और वह सिद्ध संत अगर आशीर्वाद दे देता है तो समझ लो कि अकाट्टय हो जाता है हर हाल मे कार्य सिद्ध होगा और सफलता मिलेगी।
एक समय मुझे ऐसा लगने लगा कि यह दुनिया का सबसे बड़ा काम है जैसे कि अब मैं अन्य राजनीतिक खबर विश्लेषण जरूरत भर के लिए करता हूँ पहली बात तो यह कि हमे मस्तिष्क की रक्षा करना बहुत जरूरी है जैसे कि दिन भर रात भर आप जो देखोगे जो सुनोगे वो सोचोगे और इसका तनाव भी झेलोगे इसलिए मीडिया सबके साथ अन्याय कर रहा है।
क्योंकि वह मुर्गा – मुर्गी लड़ाकर तनाव का माहौल बनाकर जाने कितनो को मन मस्तिष्क से पागल कर देगा , एक दिन ऐसा होगा कि सबको मनोवैज्ञानिक सलाह की जरूरत पड़ेगी या आप किसी दिव्य संत के चरणों मे लेटकर खुद को मानसिक रूप से स्वस्थ होने के लिए आशीर्वाद की याचना करेंगे।

इसलिए संत सेवा – दर्शन व सत्संग करना दुनिया का सबसे बड़ा काम है बस आपको छाछ – दूध मे देखते ही फर्क समझने की बुद्धि – दृष्टि विकसित होनी चाहिए , बिना स्वाद लिए बता सकें कि यह छाछ है और यह दूध है तो जिंदगी का लक्ष्य भी जानने लगेंगे।
असल मे बड़ा से बड़ा पत्रकार बन जाओ , बड़ा नेता बन जाओ या बड़ा अफसर अंततः परिणाम शून्य आना ही है और खोज सुख की सुकून की है तो अंततः जिस काम मे सुकून मिला उसे साक्षा कर बता रहा हूँ कि बहुत बड़ा बनने मे सुख नही है बल्कि उस काम मे है जिसके लिए जिंदगी ने आपको चुना है , और मुझे लगता है तमाम कद -पद के बाद भी इससे बड़ा कोई और काम मेरे जीवन का नही होगा जिससे मेरा जन्म साकार हो सके।