एक वृक्ष माँ के नाम अंतर्मन की पुकार दिव्या त्रिपाठी सोशल एक्टिविस्ट व भाजपा नेता का अंतर्मन

एक वृक्ष माँ के नाम अंतर्मन की पुकार
मैं खड़ी थी मिट्टी के उस छोटे से टुकड़े पर, जहाँ कुछ देर बाद एक जीवन जन्म लेने वाला था। हाथ में फावड़ा था, लेकिन मन में माँ की स्मृति की गहराई थी। माँ… जिसने मुझे रचा, सँवारा, धूप में छाया बनी रही, और बेमौसम की बारिश में ओढ़नी बनकर ढक लेती थीं।

आज, मैं उसी ‘माँ’ के नाम एक वृक्ष रोप रही हूँ। शब्द कम हैं यह समझाने के लिए कि माँ और वृक्ष में क्या संबंध है।
माँ भी तो धरती होती है — धैर्य से भरी, सहनशीलता की सीमा पार कर देने वाली, देने वाली… बस देती रहती है। और वृक्ष? वो भी तो माँ ही है — फल देता है, छाया देता है, जीवनदायिनी हवा देता है, फिर भी कुछ नहीं माँगता।
जब मैंने फावड़ा चलाया, तो हर मिट्टी की परत से एक स्मृति उभरती गई। माँ की हँसी, उनकी डाँट, उनका थका हुआ चेहरा और फिर भी मुस्कुराता हुआ प्रेम।
और फिर जैसे मेरा मन बोल उठा — “एक वृक्ष माँ के नाम, ताकि धरती पर ममता बनी रहे।” मैं नहीं चाहती कि यह केवल मेरा संकल्प रहे। मैं चाहती हूँ कि यह एक जन-संकल्प बने जैसे देश के प्रधानमंत्री मोदी जी ने विशेष आह्वान किया और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार उनके आह्वान को साकार करने के लिए वन ग्राम बनाने का संकल्प सिद्ध कर रही है तो हम सब अपनी-अपनी माँ के नाम एक वृक्ष लगाएँ।
क्योंकि वृक्ष सिर्फ ऑक्सीजन नहीं देते, वे स्मृति का स्थायी स्वरूप बन जाते हैं। वे हमें जोड़ते हैं हमारे मूल से — हमारी धरती से, हमारी संस्कृति से, हमारे उत्तरदायित्व से।
आज जब धरती कराह रही है, तप रही है, सूख रही है तो क्या यह समय नहीं है, जब हम लौटें वृक्ष की छाया की ओर? क्या यह वक्त नहीं है, जब हम माँ के स्पर्श को फिर से धरती पर रोपें ? यह केवल पर्यावरण की बात नहीं है, यह संवेदना की क्रांति है। यह वह बीज है, जिसमें भविष्य की शांति है।
मैं दिव्या त्रिपाठी, आज सिर्फ एक वृक्ष नहीं लगा रही हूँ, मैं एक भाव रोप रही हूँ कि जब भी कोई इस पेड़ के नीचे बैठेगा , तो उसे अपनी माँ की ममता महसूस होगी। एक छाया जो बिना शर्त के उसे ढँक लेगी।
आइए, आप भी उठाइए एक फावड़ा, थामिए एक पौधा और बोइए एक वृक्ष — अपनी माँ के नाम।
क्योंकि माँ को भेंट में फूल नहीं, वृक्ष चाहिए — जीवित, बढ़ता हुआ, ममता से भरा।