Navratri utsav युवा मांगे चंदा नरेन्द्र गुप्ता बोले मुझे दे दो , अविश्वसनीय अकल्पनीय मांग

नरेन्द्र गुप्ता ने दिखा दिया कि सही नेतृत्व केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि व्यवहार से पैदा होता है।

नवरात्रि से नशामुक्ति का संकल्प चित्रकूट के तरौंहा में नई सोच की शुरुआत

नवरात्रि का पर्व केवल देवी आराधना और उत्सव का समय नहीं है, यह आत्मशुद्धि और सकारात्मक बदलाव का भी अवसर है। चित्रकूट नगर पालिका अध्यक्ष नरेन्द्र गुप्ता ने हाल ही में तरौंहा के युवाओं के सामने जो शर्त रखी, वह इसी संदेश को साकार करती है। देवी प्रतिमा स्थापना के लिए चंदा मांगने पहुँचे युवाओं से उन्होंने कहा “मुझे नशा दो, लेकिन नशामुक्त युवा के रूप में।” यह एक साधारण वाक्य नहीं, बल्कि समाज को झकझोरने वाला विचार है।

तरौंहा और आसपास के गाँवों में नशे की प्रवृत्ति चिंता का विषय रही है। युवा पीढ़ी का ऊर्जा-स्रोत वही है, जो गाँव-समाज को आगे बढ़ा सकता है, लेकिन नशे की लत उस ऊर्जा को जला देती है। नरेन्द्र गुप्ता का यह संदेश कि “नवरात्रि से ही हर युवा किसी भी प्रकार का नशा छोड़ने का संकल्प ले”, सामाजिक नेतृत्व का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने चंदा देने की हामी भरते हुए भी यह स्पष्ट कर दिया कि असली दान केवल धन नहीं, बल्कि नशामुक्त भविष्य है।

यह पहल राजनीति से परे एक मानवीय आह्वान है। नगरपालिका अध्यक्ष के रूप में नरेन्द्र गुप्ता ने प्रशासनिक दायरे से निकलकर एक जननेता की भूमिका निभाई है। आमतौर पर नेता त्यौहारों पर धन या सामग्री देने तक ही सीमित रहते हैं, परंतु यहाँ नेता ने समाज से “व्यसन-मुक्ति” का वचन लिया है। यह दिखाता है कि राजनीति केवल चुनाव जीतने का साधन नहीं, बल्कि समाज सुधार का भी माध्यम है।

तरौंहा के युवाओं के लिए यह अवसर है कि वे नवरात्रि को केवल धार्मिक उत्सव न मानें, बल्कि आत्मशुद्धि का पर्व बनाएं। नशा छोड़ना केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, यह पूरे परिवार, गाँव और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य उपहार है। देवी दुर्गा शक्ति और संयम की प्रतीक हैं; इस पर्व पर संयम का संकल्प लेना उनकी वास्तविक आराधना होगी।

नगरपालिका अध्यक्ष की यह पहल पूरे चित्रकूट और बुंदेलखंड के लिए प्रेरणा है। यदि हर गाँव, हर मोहल्ला इसी सोच को अपनाए, तो आने वाले वर्षों में नशामुक्त समाज का सपना साकार हो सकता है। नरेन्द्र गुप्ता ने दिखा दिया कि सही नेतृत्व केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि व्यवहार से पैदा होता है।

नवरात्रि की महिमा तभी पूर्ण होगी जब हम देवी की प्रतिमा के साथ-साथ अपने भीतर की दुर्बलताओं का भी विसर्जन करें। आइए, तरौंहा के इस संकल्प को पूरे क्षेत्र का अभियान बनाएं—ताकि आने वाली पीढ़ियाँ कह सकें कि चित्रकूट ने एक पर्व को सचमुच समाज-परिवर्तन का पर्व बना दिया।