बिसलेरी नहीं, मिट्टी के घड़े का पानी पीजिए गर्मी से लड़ने का देशी रास्ता

बाजार की बोतल से ज्यादा ताकत समाज के घड़े में है। प्यास बुझाइए, पेड़ लगाइए और धरती को बचाइए।

गर्मी अब सिर्फ मौसम नहीं, संकट बनती जा रही है। सड़क पर चलते राहगीर की सबसे बड़ी जरूरत पानी है, लेकिन विडंबना देखिए कि कभी गांव-गांव में प्याऊं और घड़े समाज की संस्कृति हुआ करते थे, आज पानी भी बाजार की वस्तु बन गया है। प्यास बुझाने के लिए जेब टटोलनी पड़ती है और लोग मजबूरी में बोतलबंद पानी खरीद रहे हैं। ऐसे समय में जब गर्म हवाएं इंसान को झुलसा रही हैं, तब समाज के भीतर सेवा की परंपरा फिर से जीवित करने की जरूरत महसूस हो रही है।

इसी सोच के साथ पत्रकार शिवमंगल अग्रहरि ने चौराहे पर एक निःशुल्क प्याऊं की व्यवस्था कराई, ताकि राहगीर, मजदूर, किसान, रिक्शा चालक या कोई भी प्यासा व्यक्ति बिना पैसे खर्च किए अपना गला तर कर सके। मिट्टी के घड़े का ठंडा पानी सिर्फ प्यास नहीं बुझाता, बल्कि यह भारतीय लोकजीवन की उस संस्कृति का प्रतीक है, जहां सेवा लाभ से बड़ी मानी जाती थी।

यह सवाल भी खड़ा होता है कि आखिर ऐसा समय क्यों आया कि पानी जैसी मूलभूत जरूरत भी बिकने लगी? गांवों के कुएं सूख गए, तालाब पाट दिए गए, पेड़ कट गए और शहरों में छांव कम होती चली गई। नतीजा यह कि अब बाजार ने पानी को बोतल में बंद कर दिया और इंसान को खरीदने पर मजबूर कर दिया। लेकिन क्या हर व्यक्ति हर समय बोतलबंद पानी खरीद सकता है? जवाब साफ है कि नहीं। इसलिए समाज में प्याऊं की परंपरा का जीवित रहना सिर्फ सेवा नहीं, बल्कि जरूरत है।

प्याऊं के शुभारंभ अवसर पर उपस्थित लोगों ने भी इसे मानवीय पहल बताया। उद्घाटन करने पहुंचे खंड विकास अधिकारी संजय कुमार पाण्डेय ने सेवा भावना को समाज के लिए आवश्यक बताया और इस तरह की जनहितकारी पहल को आगे बढ़ाने का संकल्प व्यक्त किया। कार्यक्रम में पत्रकार, समाजसेवी और स्थानीय लोग भी उपस्थित रहे, जिन्होंने इस प्रयास की सराहना की।

लेकिन यह सिर्फ पानी पिलाने की खबर नहीं है, यह आने वाले संकट की चेतावनी भी है। मौसम बदल रहा है, तापमान लगातार बढ़ रहा है। वैज्ञानिक वर्षों से अलनीनो जैसी जलवायु परिस्थितियों के प्रभाव को लेकर चेताते रहे हैं। अगर पेड़ कटते रहे, जल स्रोत खत्म होते रहे और हम सिर्फ बाजार पर निर्भर होते गए, तो आने वाला समय और कठिन हो सकता है। वह दिन दूर नहीं जब तेज धूप और भीषण तापमान आम आदमी के लिए चुनौती बन जाए।

इसलिए जरूरत सिर्फ मुफ्त पानी पिलाने की नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक संकल्प की है। जैसे प्याऊं सेवा का संकल्प लिया गया, वैसे ही हर व्यक्ति एक वृक्ष लगाने का प्रण ले। अगर हर घर, हर मोहल्ला, हर गांव एक पेड़ लगाने का निर्णय कर ले, तो आने वाली पीढ़ियों को तपती धरती से राहत मिल सकती है।

संदेश साफ है कि बाजार की बोतल से ज्यादा ताकत समाज के घड़े में है। प्यास बुझाइए, पेड़ लगाइए और धरती को बचाइए।