अगर मिल जाए सोलमेट असल मे यह सिर्फ देह का नही ऊर्जा का संबंध होता है

अगर मिल जाए सोलमेट असल मे यह देह का नही ऊर्जा का संबंध होता है , रात का ख्याल……….
रात होते ही दिन या शाम को घटी घटनाएं महसूस होने लगती है सचमुच जैसी फीलिंग्स हों लिखना बोलना चाहिए , रात मे सबसे ज्यादा क्या प्रबल होता है ? रात जैसे ही उतरती है, भीतर कहीं हल्की – सी हलचल शुरू हो जाती है। दिन भर की आवाज़ें शांत हो जाती हैं, पर मन की आवाज़ें साफ सुनाई देने लगती हैं। सच तो यह है कि रात सिर्फ समय नहीं होती, वह एहसासों की सबसे गहरी परत होती है , जहाँ हम सबसे ज्यादा अपने होते हैं।
कभी ऐसा भी होता है कि किसी से एक छोटी-सी मुलाकात पूरे अस्तित्व में उतर जाती है। मिलना भले दिन में हुआ हो, पर उसका असर रात तक आत्मा में लहराता रहता है। जैसे कोई हल्की रोशनी भीतर जल गई हो।
तब महसूस होता है कि चेतना सिर्फ सोच नहीं, एक जीवित ऊर्जा है, जो किसी की मौजूदगी को देर तक महसूस कराती रहती है। हर मुलाकात कुछ न कुछ छोड़ जाती है। किसी की मुस्कान, किसी की आवाज़, किसी की खुशबू, या बस एक अनजाना-सा खिंचाव।
पर जब यह एहसास गहराई में उतर जाए, जब मन बिना वजह शांत हो जाए, जब भीतर कोई मधुर-सा सम्मोहन ठहर जाए — तब शायद हम सोलमेट के स्पर्श के करीब होते हैं।
हमारे अंदर चेतन ऊर्जा ही तो है जो महसूस कराती है शाम की दस्तक को और रात तक चेतना मे महसूस होना कि हाँ उसमे कुछ खास है तो इस तरीके से सोलमेट को पहचान सकते हैं।
सोलमेट पहचानना कोई अचानक होने वाला चमत्कार नहीं, यह एक धीमी अनुभूति है। जैसे कोई तरंग जन्म ले और समय के साथ देखना हो कि वह कितनी देर तक भीतर स्थिर रहती है। यदि उसकी छाप मन से मिटती नहीं, यदि उसका स्मरण सुकून देता है, तो उस रिश्ते को समय देना चाहिए।

क्योंकि हर मिलने वाला फीलिंग्स देता जरूर है भले मिलने पर अच्छा ना लगे या बहुत अच्छा लगे या वो दिल मे कहीं स्पर्श कर जाए जैसे कि वो मुस्कान हो सकती है जैसे कि वो सुगंध हो सकती है जैसे कि गहरे कहीं सम्मोहन छा जाए , हाँ तो कुछ ऐसा ही होता है जब सोल मेट से आपकी मुलाकात होती है।
इसलिए सोल मेट एक बहुत बड़ी खोज है और जब सुकून महसूस हो किसी से तो समझ लेना कि वह दोस्त हो सकता है , प्रेम हो सकता है या किसी और रिश्ते मे भी जीवन मे उसकी चहल पहल हो सकती है। और यह होता है जब देह से परे आत्मा की ऊर्जा स्पर्श करे इसलिए रात का ख्याल दिन भर का अहसास उतारना वास्तव मे जिंदगी को दिशा देने जैसा होता है।
अगर आप सोल मेट जैसे रिश्ते को महसूस करते हैं तो तनिक ठहरकर विचार करिएगा कि कौन है आपका सोल मेट ? क्या कभी आपकी मुलाकात सोल मेट से हुई ? अगर हाँ तो क्या वो आपके जीवन मे है ? और अगर नही है तो हो सकता है कि वो मिला हो और तमाम संकोच आदि के कारण से कह ना सके हों और सिर्फ महसूस कर रह गए हों। असल में यह देह का नहीं, ऊर्जा का संबंध होता है। एक ऐसा स्पर्श जो दिखाई नहीं देता, पर जीवन की दिशा बदल देता है।