बगैर विज्ञापन की पत्रकारिता लेखक पत्रकार सौरभ द्विवेदी की कलम से

विज्ञापन के बगैर पत्रकारिता की कल्पना की जा सकती है ? और पत्रकार को विज्ञापन देगा कौन ? इसका खास निर्धारण है ? बगैर धन लगाए पत्रकारिता की जा सकती है !

15 अगस्त सिर्फ आजादी का दिन नही है यह प्रेशर का भी दिन है , पत्रकारों के लिए ! यार विज्ञापन देना है और विज्ञापनदाता इन दिनों रणछोड दास बनकर भाग रहे होते हैं।

यह खेल भी बड़ा गजब है जबकि बहुत सरल बात है कि गुरू पूर्णिमा मे गुरूदेव को पूजते हो , चरणामृत पीते हो और दक्षिणा चढ़ाते हो तो पत्रकार आपके तमाम कार्यों का प्रकाशन करता है , वह शब्द – चित्र का श्रृंगार कर आपका व्यक्तित्व प्रकाशित करता है।

Donate for freedom of journalism

इसलिए उसके हृदय की भावनाओं को छिन्न-भिन्न किए बिना सामने से आकर कहना चाहिए कि भाई आपने मेरी खबर लगायी है , आपने बताया था कि हमने इतने कंबल बांटे थे और आपने यह भी बताया था कि हमने गरीब आदमी का इलाज कराया है।

जब मैं मंच मे था तो आपने मेरी लाजवाब फोटो क्लिक की जिससे मेरा कद बढ़ा और ऐसे बहुत है दैनिक क्रिया के कार्य भी आप बताते रहते हो तो भाई तमाम दान की तरह मेरा कर्तव्य है कि मैं आपकी आत्मा का सम्मान करते हुए लेखक की स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए विज्ञापन के रूप मे सहयोग कर रहा हूँ।

अब चलनी लेकर खोजना हो तो कितना दुख होता है कि यार विज्ञापन भी मांगना है , अरे फोन उठेगा कि नही उठेगा ! कितना दर्द है ना !

खून के आंसू बहाते हैं पत्रकार अगर उनका दर्द भी लीडरशिप को , प्रशासन को और शासन को महसूस हो जाए अलबत्ता वह बात अलग है राष्ट्रीय मीडिया के चेहरे , तो वह क्लास की बात है बल्कि लोकतंत्र तो यही कहता है कि अंतिम पंक्ति के व्यक्ति का विकास तो जनपद का ग्रामीण पत्रकार वह अंतिम व्यक्ति तो है ही लेकिन बदनाम है कि पत्रकार है तो सब जगह से आ रहा है , किन्तु सत्य दर्पण को ही मालूम होता है कि मुझ मे चेहरा कौन देख रहा है।

बहुत अधिक तकलीफ संवेदनशील आत्मीय स्तर के पत्रकारों को तो होती है इसलिए लिखते पढ़ते बोलते हुए भी बहुत से साथी बिना विज्ञापन ऐसे रहते हैं जैसे उनकी दीवाली हुई ही नही , और इस दिन बहुतों की दीवाली हो भी जाती है क्योंकि किसी की जेब से धन निकालना भी एक हुनर है जो इस हुनर मे पीछे है वह फकीर पत्रकार है…..