
सास बहू का रिश्ता आधुनिक माहौल में
( दिव्या त्रिपाठी की कलम से )
कभी-कभी ज़िंदगी में रिश्ते हमें समझाने नहीं, महसूस कराने आते हैं — और प्रिया का मेरे जीवन में आना शायद ऐसा ही एक अध्याय है।
आधुनिकता क्या है ? जो आज है वही आधुनिक है जो कल था वो भी आज था तब भी आधुनिक शब्द चरितार्थ था तो इसलिए आधुनिक कुछ और नही हमारा आज है , आज भी रिश्ते नाते वैसे ही प्रश्न करते हैं और वैसे ही जवाब चाहते हैं और हर रिश्ते का लक्ष्य सुख मिलना है तो सास – बहू का रिश्ता पूरे परिवार मे पीढ़ी दर पीढ़ी खुशहाली का सूचकांक तय करता है।
करीब 5 महीने पहले जब प्रिया हमारे घर आई थी, तो बस एक उम्मीद थी कि वो इस परिवार में रच-बस जाए, खुश रहे। मैंने नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी वो इस घर की धड़कन बन जाएगी।
गांव से आई, सादगी में पली-बढ़ी, चेहरे पर वह अपनापन जैसे अपनेपन का दूसरा नाम ही प्रिया हो। मैंने शुरू से ही एक बात ठान ली थी कि मैं उसे बहू नहीं, बेटी मानूंगी। घर में जो भी काम, जो भी बात उसमें उसका मत, उसकी मुस्कान, उसकी आदतें… सबको जगह दी। और आज महसूस करती हूँ कि जब किसी को जगह दी जाती है, तो वो हमारे दिल में घर बना लेता है।
प्रिया ने न सिर्फ घर के तौर-तरीके सीखे, बल्कि घर को नई ऊर्जा दी। वो जब रसोई में गुनगुनाती है, तो लगता है मानो लक्ष्मी स्वयं द्वार पर मुस्कुरा रही हो। जब शाम को लिविंग में बैठकर हम दोनों चाय पीते हैं, तो हँसी के वे हल्के पल घर को ऊर्जावान बना देते हैं।
अक्सर लोग कहते हैं सास-बहू का रिश्ता मुश्किल होता है, पर मेरा अनुभव कहता है कि रिश्ता मुश्किल नहीं, हमारे विचार मुश्किल होते हैं। क्योंकि अक्सर हम मान मर्यादा के चलते रिश्तों मे कब अहंकार को पालने लगते हैं और उसके विजय के लिए अपनापन को खोखला कर परास्त कर देते हैं तो ऐसे मे घरों मे सास बहू की जंग का माहौल बना रहता है जिसका परिणाम यह होता है कि घर की प्रगति मे राहु – केतु का प्रकोप लग जाता है। और इतनी सी बात को कोई महसूस नही करता कि आखिर क्यों गरीबी है ? क्यों संकट है ? गरीबी और संकट को दूर करने का उपाय घर की खुशहाली है कि घर को नरक नही स्वर्ग जैसा माहौल देना होगा , जिसका उपाय हर रिश्ते की ऊर्जा मे छिपा है और यही सच भी है।
अगर सास थोड़ी माँ बन जाए और बहू थोड़ी बेटी बन जाए, तो घर में हर सुबह बसंत बन जाती है। और दोपहर तक समझदारी की साझेदारी नजर आने लगती है और रात को सुकून भरी नींद आने लगती है तो ऐसी ही दिनचर्या का जीवन जीने वाले लोग घर से शुरु कर बाहर तक हर कार्य मे सफलता अर्जित करते हैं , बेटियों को महिलाओं को अगर लक्ष्मी की संज्ञा दी गई है तो इसके पीछे का रहस्य यही है कि वह ऐसी ऊर्जा का निर्माण करती हैं जो सफलता के आकर्षण की वजह होती है , इसलिए निर्णय आपको लेना है कि राजमहल की मंथरा बनना है कि लक्ष्मी ?
प्रिया ने मुझे वो एहसास दिया जो शायद हर माँ चाहती है कि उसका परिवार हँसी से भरा रहे। उसके सहज व्यवहार ने घर की हवा तक को सुकून दिया है। मैं देखती हूँ कि जब वह सबके साथ हँसती-खिलखिलाती है, तो मेरे भीतर गर्व की एक लहर उठती है कि मैंने बहू नहीं, एक बेटी पाई है और मेरी बातों को उसने गंभीरतापूर्वक स्वीकार किया है।
आज जब मैं बुन्देलखण्ड और उत्तर प्रदेश की और बहुओं-सासों को देखती हूँ, तो यही कहना चाहती हूँ थोड़ा अपनापन दीजिए, थोड़ी जगह दीजिए, और देखिए रिश्ते खुद – ब – खुद फूल बनकर खिल उठेंगे।
सास-बहू का रिश्ता यदि प्रेम से पला-बढ़ा हो,
तो घर केवल मकान नहीं रहता , वो संस्कारों का आंगन बन जाता है। मेरा विश्वास है कि हर सास को अगर बेटी का सुकून चाहिए, तो पहले उसे बेटी की तरह अपनाना सीखिए। क्योंकि बहू घर लाती है नई परंपरा और सास देती है उस परंपरा को दिशा।
यही संतुलन घर को “घर” बनाता है। जो सभी चाहते हैं कि जीवन मे रत्ती भर संघर्ष ना हो और अगर कोई संघर्ष सामने आया तो उसे साथ मिलकर जीत लेंगे , जैसे मकान की नींव मजबूत रखने से पूरी इमारत अनंतकाल तक टिकी रहने का विश्वास होता है वैसे ही घर – परिवार मे रिश्ते की नींव मजबूत रहने से पीढ़ी दर पीढ़ी खुशियाँ बढ़ती हैं।
एक समृद्धशाली समाज का निर्माण करना है तो सचमुच सोचिए और निर्णय लीजिए कि सामाजिक स्तंभ को सुंदर आकर्षक बनाए रखने के लिए हर कोशिश में यही करना है कि रिश्तों मे अपनत्व की मिठास घोलकर भावनाओं का शर्बत पान कर आपस मे अद्भुत ऊर्जा का संचार करेंगे जिसमे सास बहू का रिश्ता महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकता है।








