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कुणाल प्रताप सिंह, जिन्हें स्थानीय लोग “सरकार” के नाम से जानते हैं, आज चित्रकूट की सामाजिक चेतना में एक अलग ही पहचान बना चुके हैं। राजनीति में सक्रिय होते हुए भी उनकी असली पहचान उन कामों से बनी है, जिनसे अक्सर लोग दूर भागते हैं लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करना।

यह वही कठोर और संवेदनशील कार्य है, जिसमें न सिर्फ साहस चाहिए, बल्कि भीतर से एक गहरी मानवीय करुणा भी चाहिए। “सरकार” ने इसे अपनी समाजसेवा का प्रमुख हिस्सा बना लिया है। ऐसे समय में जब समाज का बड़ा वर्ग इन जिम्मेदारियों से कतराता है, कुणाल प्रताप सिंह का यह कदम उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करता है।

उनकी राजनीतिक यात्रा जनसत्ता दल से शुरू होती है वह दल जिसे रघुराज प्रताप सिंह ने खड़ा किया। एक ऐसा दल, जो अपनी अलग राजनीतिक शैली और प्रभाव के लिए जाना जाता है। वर्तमान परिदृश्य में यह दल भारतीय जनता पार्टी के समर्थन में दिखाई देता है, और इसी संदर्भ में कुणाल प्रताप सिंह ने 2027 में योगी आदित्यनाथ की वापसी का सार्वजनिक दावा भी किया है।

लेकिन “सरकार” की कहानी केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। यह कहानी उस मानवीय संवेदना की है, जो उन्हें समाज के सबसे कठिन और अनदेखे कोनों तक ले जाती है।

एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल व्यक्ति, जिसने अपनी रीढ़ (बैक बोन) खो दी थी—उसकी जिंदगी बचाने का अवसर जब कुणाल प्रताप सिंह को मिला, तो उन्होंने न केवल इलाज की व्यवस्था कराई, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया को एक जिम्मेदारी की तरह निभाया। बाद में एक टीवी कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि किसी की जिंदगी बचा लेना ही सबसे बड़ा परोपकार है—और यही वह क्षण था, जहां “राजनीतिज्ञ” से ज्यादा “इंसान” सामने आया।

उनकी यह सोच बताती है कि सेवा उनके लिए दिखावा नहीं, बल्कि आत्मसंतोष का माध्यम है। लावारिस शवों का अंतिम संस्कार हो या किसी घायल की जिंदगी बचाना। इन कार्यों में उन्हें जो सुकून मिलता है, वही उनकी असली पूंजी है।

आज के समय में, जब राजनीति अक्सर आरोप-प्रत्यारोप और सत्ता संघर्ष तक सीमित दिखती है, कुणाल प्रताप सिंह जैसे चेहरे यह याद दिलाते हैं कि जनसेवा अभी भी राजनीति की आत्मा हो सकती है।

“सरकार” की कहानी केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि उस विचार की कहानी है, जिसमें सेवा, संवेदना और समाज के प्रति उत्तरदायित्व सर्वोपरि है। यही कारण है कि चित्रकूट की गलियों से निकलकर उनकी यह पहचान अब एक ऐसी प्रेरणा बनती जा रही है, जिसे प्रकाश में आना ही चाहिए—ताकि समाज यह समझ सके कि असली “सरकार” वही है, जो लोगों के दुःख में उनके साथ खड़ी होती है।

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