
स्त्रियां कितनी भी आजाद क्यों न हों, उन्हें कोई मुक्ति नहीं मिल सकती जब तक उन्हें अपने स्तनों को ब्रा में ठूंसना पड़ता रहेगा। दो सिले हुए कप जो स्त्री के इस हिस्से यानी स्तन से बिल्कुल बेमेल हैं, तथाकथित स्त्रीत्व के ये घिनौने प्रतीक हैं।
स्त्रियों से अक्सर उम्मीद की जाती है कि वे अपने शरीर को एक खास तरीके से प्रस्तुत करें, ताकि वह ‘सभ्य’ दिखें। ‘ब्रालेस मूवमेंट’ इस धारणा को चुनौती देता है।
हाल के वर्षों में, विश्वभर में स्त्रियों के बीच ब्रालेस आंदोलन तेजी से उभर रहा है। यह आंदोलन केवल एक फैशन प्रवृत्ति नहीं है, बल्कि स्त्रियों की स्वतंत्रता, आत्म-स्वीकृति और सामाजिक मानदंडों के खिलाफ एक शक्तिशाली बयान है। भारत जैसे देश में, जहां सामाजिक और सांस्कृतिक मानदंडों का गहरा प्रभाव है, ब्रालेस मूवमेंट ने न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात को उजागर किया है, बल्कि लैंगिक समानता और शारीरिक स्वायत्तता जैसे गंभीर मुद्दों को उभारा है।

इस मूवमेंट की जड़ें 1960 के दशक के पश्चिमी स्त्रीवादी आंदोलनों में मिलती हैं, जब दूसरी लहर के स्त्रीवाद ने स्त्रियों के शारीरिक और सामाजिक मुक्ति के लिए आवाज उठाई। उस समय, ब्रा को सामाजिक अपेक्षाओं और पितृसत्तात्मक संरचनाओं के प्रतीक के रूप में देखा गया, जो महिलाओं के शरीर को नियंत्रित करने का एक साधन था।
1968 में मिस अमेरिका पेजेंट के दौरान हुए विरोध प्रदर्शन, जिसमें महिलाओं ने ब्रा और अन्य ‘दमनकारी’ वस्त्रों को प्रतीकात्मक रूप से जलाने की बात कही, ने इस आंदोलन को वैश्विक ध्यान दिलाया।
हालांकि, यह धारणा कि ब्रा जलाना इस आंदोलन का केंद्रीय हिस्सा था, काफी हद तक अतिशयोक्ति थी।
आधुनिक ब्रालेस मूवमेंट 2010 के दशक में सोशल मीडिया के उदय के साथ फिर से उभरा। #Freethenipple, #NoBraDay जैसे हैशटैग्स ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लाखों स्त्रियों को एकजुट किया, जिन्होंने अपने शरीर को लेकर सामाजिक नियमों को चुनौती दी। यह आंदोलन केवल ब्रा न पहनने की बात के लिए नहीं था, बल्कि यह स्त्रियों के शरीर को यौनिकरण से मुक्त करने और उन्हें अपनी शारीरिक स्वायत्तता पर नियंत्रण देने का प्रयास था।
भारत में, जहां परंपराएं और सामाजिक मानदंड गहरी जड़ें जमाए हुए हैं, ‘ब्रालेस मूवमेंट’ का स्वरूप कुछ हद तक अलग है। भारतीय समाज में स्त्रियों के शरीर को लेकर कई तरह की अपेक्षाएं और प्रतिबंध हैं। पारंपरिक परिधानों जैसे साड़ी और सलवार-कमीज में भी ब्रा को अनिवार्य माना जाता है, भले ही वह स्वास्थ्य या आराम के दृष्टिकोण से जरूरी न हो।
इस मूवमेंट ने भारत में महिलाओं को यह सवाल उठाने का मौका दिया है कि क्या ये अपेक्षाएं वास्तव में उनकी जरूरतों को पूरी करती हैं या केवल सामाजिक दबाव का हिस्सा हैं।

हाल के वर्षों में, भारतीय शहरों में युवा महिलाओं ने इस मूवमेंट को अपनाना शुरू किया है। सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम और ट्विटर (अब x ) ने इसको बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
कई भारतीय प्रभावशाली हस्तियों ने अपने बयानों और कार्यों के माध्यम से शारीरिक स्वायत्तता और आत्म-स्वीकृति की वकालत की है। हालांकि, यह आंदोलन अभी भी मुख्यधारा में पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया है, और इसे लेकर कई तरह की बहसें चल रही हैं।
इस मूवमेंट के पीछे कई कारण हैं, जो इसे केवल एक फैशन ट्रेंड से कहीं अधिक बनाते हैं।
कई अध्ययनों ने यह संकेत दिया है कि लंबे समय तक टाइट-फिटिंग ब्रा पहनने से शारीरिक असुविधा, त्वचा में जलन, और यहां तक कि रक्त संचार में बाधा हो सकती है।इस मूवमेंट ने महिलाओं को यह सोचने के लिए प्रेरित किया है कि क्या ब्रा वास्तव में उनके लिए आरामदायक है या नहीं। भारत में, जहां गर्म और उमस भरा मौसम आम है, ब्रालेस हो जाना कई महिलाओं के लिए अधिक आरामदायक विकल्प बन गया है।
ब्रा को अक्सर महिलाओं के शरीर को ‘आकर्षक’ बनाने के लिए जरूरी माना जाता है। यह मूवमेंट इस विचार को खारिज करता है और प्राकृतिक शरीर को स्वीकार करने की वकालत करता है। यह आंदोलन कहता है कि सुंदरता का कोई एक मानक नहीं हो सकता और हर महिला का शरीर अपने आप में सुंदर है।
पुरुषों के लिए जहां शर्टलेस होना सामान्य माना जाता है, वहीं महिलाओं के लिए ब्रालेस होना अस्वीकार्य माना जाता है। यह दोहरा मापदंड लैंगिक असमानता को दर्शाता है।
भारत जैसे रूढ़िवादी समाज में ब्रालेस मूवमेंट को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यहां इसे अक्सर ‘अश्लील’ या ‘अनुचित’ माना जाता है। सार्वजनिक स्थानों पर ब्रालेस स्त्रियों को घूरने, टिप्पणी करने या यहां तक कि उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है।
यहां की अधिकतर जगहों में ब्रा को ‘शालीनता’ का प्रतीक माना जाता है, और इसे न पहनना यानी आप संस्कृति के खिलाफ हैं।
भारत में महिलाओं की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है। ब्रालेस मूवमेंट को अपनाने वाली महिलाओं को यह डर रहता है कि वे सामाजिक उत्पीड़न या हिंसा का शिकार हो सकती हैं।
विज्ञापनों में अक्सर यह दिखाया जाता है कि ब्रा के बिना महिलाएं ‘अपूर्ण’ हैं। यह प्रचार भी स्त्रीवादियों के लिए एक बड़ी चुनौती है।
तमाम चुनौतियों के बावजूद, ब्रालेस मूवमेंट ने कई सकारात्मक बदलाव लाए हैं।
इसने स्त्रियों को अपने शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया है। कई महिलाएं अब ब्रा के स्वास्थ्य प्रभावों पर सवाल उठा रही हैं और अधिक आरामदायक विकल्पों की तलाश कर रही हैं।
कई डिजाइनर अब ऐसे कपड़े डिजाइन कर रहे हैं जो ब्रा के बिना भी आरामदायक और स्टाइलिश हों।
इस आंदोलन को पूरी तरह स्वीकार किए जाने में अभी समय लगेगा, लेकिन यह निश्चित रूप से एक नई शुरुआत है। अमेरिकी राजनीतिक सिद्धांतकार एवं स्त्रीवादी लेखिका आइरिस मैरियन यंग कहती हैं कि, ‘ब्रा स्पर्श में बाधा उत्पन्न करती है और बिना ब्रा वाली स्त्री वस्तुविहीन हो जाती है, जिससे वह कठोर, नुकीला रूप समाप्त हो जाता है जिसे लिंग संबंधी संस्कृति आदर्श मानती है।
ब्रा के बिना स्त्रियों के स्तन एकसमान आकार की वस्तु नहीं होते, बल्कि महिला के हिलने-डुलने के साथ बदलते हैं, जो प्राकृतिक शरीर को दर्शाता है। ब्रा का उपयोग लड़कियों को उनके स्तनों को यौन वस्तु के रूप में सोचने के लिए प्रेरित करने और उनकी कामुकता को उभारने के लिए किया जाता है। अमेरिकी संस्कृति में, स्तन पूंजीवादी, पितृसत्तात्मक अमेरिकी मीडिया-प्रभुत्व वाली संस्कृति के अधीन हैं, जो स्तनों को कुछ और से पहले एक वस्तु बनाती है और उन्हें नियंत्रित कर लेती है।’
पितृसत्तात्मक समाज में जाहिर है ब्रा पहनने का निर्णय पुरुष दृष्टि द्वारा नियंत्रित होता है। मातृसत्ता इससे निजात दिलाएगी, कम से कम मुझे इस बात का मुगालता नहीं है।
स्त्रीवाद व्यावहारिकता में लाना ही आपको स्त्रीवादी कहलाता है, यह मूल है।
यह प्रसंग इसी बात की तस्दीक करता है। मार्च 2017 में, अभिनेत्री एम्मा वॉटसन वैनिटी फेयर के एक फोटोशूट में बिना ब्रा के दिखीं। कुछ लोगों ने उनकी आलोचना की। उन्होंने जवाब दिया, ‘स्त्रीवाद स्त्रियों को विकल्प देने के बारे में है, स्त्रीवाद कोई छड़ी नहीं है जिससे दूसरी स्त्रियों को पीटा जाए। यह आजादी के बारे में है, यह मुक्ति के बारे में है, यह समानता के बारे में है। मुझे सच में नहीं पता कि मेरे स्तनों का इससे क्या लेना-देना है।’
मुझे बहुत छोटी उम्र में, किशोरावस्था में ही यह एहसास हो गया था कि ब्रा पहनना असहज होता है, कम से कम मेरे लिए तो। मुझे इससे जरा भी फर्क नहीं पड़ता कि आप मेरे निप्पल या मेरे स्तनों का आकार देख पा रहे हैं या नहीं। हम सबके पास ये होते हैं। मुझे नहीं लगता कि यह आपत्तिजनक है। मैंने अधिकतर बिना ब्रा के रहने की कोशिश की और मुझे यह ज्यादा पसंद आया। यह फैसला कि एक स्त्री अपने शरीर के साथ जो कुछ भी करती है, वह किसी और को तय करने की इजाजत नहीं देता। पर पितृसत्ता इसे राजनीतिक फैसला मानती है, मानेगी ही।
अमेरिकी-ब्रिटिश कवि सवाना ब्राउन ने एक यूट्यूब वीडियो, ‘सैव्स गाइड टू गोइंग ब्रालेस’ प्रकाशित किया, जिसे खूब सराहा और पसंद किया गया। अमेरिकी निर्देशक लीना एस्को के निर्देशन में वर्ष 2014 में ‘फ्री द निप्पल’ नाम की एक फिल्म बनी। इसके बाद तो स्त्रियों ने ‘फ्री द निप्पल’ अभियान में और जोर-शोर से हिस्सा लिया। उन्होंने उन जगहों पर स्तनों को दिखाने से जुड़े कानूनी प्रतिबंधों और सांस्कृतिक वर्जनाओं का विरोध किया जहां पुरुषों के लिए टॉपलेस होना कानूनी है।
‘फ्री द निप्पल’ अभियान की शुरुआत आंशिक रूप से दोहरे मानदंडों और सोशल मीडिया पर स्त्रियों के शरीर की सेंसरशिप के कारण हुई थी। इसके समर्थकों का मानना है कि स्त्रियों के निप्पल कानूनी और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य होने चाहिए।
पांखी मे प्रकाशित लेख का अंश








