
संजय पाण्डेय, खंड विकास अधिकारी, पहाड़ी, जनपद चित्रकूट
“पृथ्वी के फेफड़े” को बचाने की पहाड़ी पहल गांव से उठती हरियाली की पुकार
जलवायु परिवर्तन अब किसी किताब या शोध का विषय मात्र नहीं रहा, बल्कि यह गांव-गांव, खेत-खलिहानों और मनुष्य की साँसों तक पहुँच चुका है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में स्थित चित्रकूट जनपद का ‘पहाड़ी’ विकास खंड, जो मंदाकिनी नदी की गोद में बसे ग्रामों से घिरा है, अब पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक जागरूक कदम उठा रहा है।

खंड विकास अधिकारी संजय पाण्डेय ने ‘पृथ्वी के फेफड़े’ माने जाने वाले वृक्षों को लेकर जिस चिंता और जागरूकता का परिचय दिया है, वह न केवल स्थानीय स्तर पर अनुकरणीय है, बल्कि इसे राष्ट्रीय पर्यावरण आंदोलन का एक प्रभावी मॉडल बनाया जा सकता है।
गांवों में पर्यावरण चेतना का संचार
संजय पाण्डेय ने देवल चौरा, अरछा बरेठी जैसे नदी तटीय गांवों का दौरा कर प्रधानों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि बरसात की शुरुआत से पहले ही नदी किनारे वृक्षारोपण शुरू किया जाए। यह केवल प्रतीकात्मक प्रयास नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की स्थानीय रणनीति है।
‘वन ग्राम’ की अवधारणा
“हर गांव एक वन ग्राम बने” — यह विचार आने वाले समय में ग्रामीण भारत की पर्यावरणीय रीढ़ बन सकता है। जब हर गांव खुद को प्रकृति का रक्षक समझेगा, तब ही तापमान वृद्धि, भूमि कटाव, और जल संकट जैसी समस्याओं का प्रभावी समाधान संभव होगा।
वृक्षारोपण: समाधान की जड़ें
जिस तरह मानव शरीर के लिए फेफड़े अनिवार्य हैं, उसी तरह धरती के लिए वृक्ष। खंड विकास अधिकारी का यह कथन कि “अगर वृक्ष लगेंगे, तभी तापमान कंट्रोल होगा,” वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है। वृक्ष न केवल कार्बन डाइऑक्साइड सोखते हैं, बल्कि नमी बनाए रखते हैं, जल स्तर को स्थिर करते हैं और छाया व शीतलता प्रदान करते हैं।
गांव से ग्लोबल तक: एक हरित संदेश
गांवों से उठने वाली यह हरियाली की पुकार अब वैश्विक मंच तक पहुँचनी चाहिए। भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार के वन विभाग द्वारा वृक्षारोपण अभियानों को जब तक जनता का सीधा समर्थन नहीं मिलेगा, तब तक यह प्रयास अधूरे रहेंगे। इसीलिए अब जरूरत है कि वृक्षारोपण को सिर्फ सरकारी योजना न मानकर जनआंदोलन बनाया जाए — एक ऐसा आंदोलन जो हर नागरिक की आदत बन जाए।
जलवायु परिवर्तन की चुनौती को मात देने का सबसे सीधा और सरल तरीका यही है कि हम फिर से वृक्षों से रिश्ता जोड़ें। चित्रकूट के पहाड़ी ब्लॉक की यह पहल बताती है कि अगर नीयत साफ हो और दृष्टिकोण सतत विकास का हो, तो गांव भी ग्रीन रिवोल्यूशन के नायक बन सकते हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि “पर्यावरण संरक्षण” सिर्फ भाषणों में नहीं, बल्कि गांव के गलियारों और खेतों की मेड़ों में दिखे। हर घर एक पौधा लगाए, हर गांव एक जंगल बनाए — तभी बचेगा जीवन, तभी बचेगी पृथ्वी।
लेखक पत्रकार सौरभ स्वतंत्र द्विवेदी की कलम से
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