
“गौसेवा के नाम पर जिसने दुरुपयोग किया, उसे काल गिन-गिन कर भोग देगा। उसका कुल भी चैन न पाएगा।”
गायों के भोज भुगतान के बीच बड़ा सवाल क्या गोसेवा अब सिर्फ बजट की फाइलों में सिमट गई है !
भविष्य मालिका पुराण कलियुग की भयावहताओं का जो खाका खींचती है, उसमें गौ-सेवा से जुड़ी अवमाननाएं सबसे बड़े पापों में गिनी गई हैं। पुराण कहता है कि “जब गौचार भूमि पर कब्जे होंगे, जब गौभोजन को राजनीति निगल जाएगी तब कलियुग अपनी चरम सीमा पर होगा।”
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने ‘गौ सेवा’ को अपने नैतिक और सांस्कृतिक एजेंडे का केंद्रीय बिंदु बनाया था। लेकिन आठ साल बाद भी ज़मीनी सच्चाई उलटी तस्वीर पेश कर रही है।

ग्राम प्रधानों की आंखों में आंसू हैं, गायों के पेट में भूख है और बजट की फाइलों में लेट पेमेंट की गर्द जमी है। क्या प्रधानों के आंसुओ मे सच्चाई है या भुगतान के भोग का सवाल है ? बड़ा सवाल है कि गाय को भूसा हरा चारा वास्तव मे मिल रहा है या धान का रूखा सूखा पैरा खिलाकर मरने को मजबूर किया जा रहा है !
प्रधान कहते हैं कि पेमेंट महीनों से अटका रहता है, और जब आता है, तो वह भी चुपचाप “क्लेम” कर लिया जाता है जिसमे कहीं पचास प्रतिशत तो कहीं पच्चीस प्रतिशत तक काट लिया जाता है तो भोग किसका हुआ ? गोवंश का, या उस अधिकारी का जिसने कागज़ों पर दस्तखत किए ?

चित्रकूट जैसे जिलों में हाल ही में ब्लॉक स्तर पर भुगतान हुआ है, पर न कहीं गोशालाओं की स्थिति सुधरी, न गायों की सेवा के दृश्य बदले कुछ अपवाद स्वरूप कहीं हालात सुधरते नजर आते हैं। सवाल उठता है कि अगर ये पैसा गोसेवा के नाम पर लिया गया, तो पुण्य किसे मिला और पाप कौन भोगेगा ?
भविष्य मालिका चेतावनी देती है
“गौसेवा के नाम पर जिसने दुरुपयोग किया, उसे काल गिन-गिन कर भोग देगा। उसका कुल भी चैन न पाएगा।”
धार्मिक दृष्टिकोण से देखें तो कमाई का दशमांश दान में देना पुण्य है, लेकिन सरकारी फंड से मिली राशि का दुरुपयोग करके गोसेवा के पुण्य का अवसर पाप में बदल देना , एक अदृश्य श्राप को न्योता देना है।
गोवंश का भोग असल में गाय नहीं, वो सत्ता, वो सिस्टम, और वो समाज कर रहा है, जिसने गोमाता को नारे का हिस्सा तो बना लिया, पर सेवा का केंद्र नहीं।
भविष्य मालिका की दृष्टि में यह कलियुग का चरम पाप है, और इसका दंड न केवल इस जन्म में, बल्कि कुल – वंश में भुगतना होगा।