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मानसिक उत्थान होते ही खुशी सदा के लिए स्थिर हो जाएगी अन्यथा कभी दुख कभी सुख हासिल हुए पद और पुट्ठों से निकल चुके पद की तरह आते जाते रहेंगे और अंत मे निर्णय यह निकलेगा कि जीवन भर मे हासिल क्या किया ?

रात है ! दिल खोलकर क्या कहा जाए ? दिन भर मे कितने मनोभाव बनते हैं – बदलते हैं और देह के अंतर में अर्थात अंतर्मन मे ज्वर से लेकर कितने रसायन उपजते हैं और हम सोचते हैं कि कोई हमारा दुश्मन है !

हम यह क्यों नही सोचते कि मैं खुद का दुश्मन हूँ , एक दुश्मन मेरे अंदर मैं ही बैठा हूँ। मुझे कहीं और लड़ाई नही लड़नी जितनी महत्वपूर्ण लड़ाई खुद से लड़नी है !

एक लड़ाई निरंतर अंदर चलती है जिसे हम स्वीकारते नही कहीं बाहर किसी से भी नही किन्तु अंदर ही अंदर खोखले होते चले जाते हैं , तभी तो मृत्यु आ जाती है !

हम कहीं किसी और से दुखी नही हैं क्योंकि मैं खुद से ही दुखी हूँ जितना दुख का पालन-पोषण मैं खुद के लिए खुद कर लेता हूँ उतना भला कोई बाहर का मुझ में मेरे अंदर दुख भेज सकता है ? दुख पैदा कर सकता है तो जवाब बिल्कुल नही !

हम अक्सर उन चीजों से खुश होते हैं और खुद का कद बड़ा मानने लगते हैं जो हमारी कभी थी नही और जब हमारी हुई तो हमने माना कि मैं खुश हूँ और बड़ा महत्वपूर्ण आदमी हूँ जबकि मैंने खुद से ना भगवान बनाया ना भगवान देखा यहाँ तक कि एक पत्थर मे भी मूर्ति गढ़कर भगवान नही बनाया तो तमाम सांसारिक चीजें जो हमारी हैं ही नही जिसका जाना एक दिन तय है उसका क्या जश्न और क्या दुख ? इसलिए श्रीकृष्ण ने समभाव की बात कही थी।

चिंतन मनन उत्थान का होना चाहिए और हर एक अवसर उत्थान का बनना चाहिए अगर खुद के उत्थान के लिए काम कर लिया तो मानसिक उत्थान होते ही खुशी सदा के लिए स्थिर हो जाएगी अन्यथा कभी दुख कभी सुख हासिल हुए पद और पुट्ठों से निकल चुके पद की तरह आते जाते रहेंगे और अंत मे निर्णय यह निकलेगा कि जीवन भर मे हासिल क्या किया ?

अगर बहुत से सवाल जीवन के लिए आएं तो महसूस करिए कि आत्मा कुछ चाहती है और देह कुछ कर रही है तो आत्मा और देह का योग सुनिश्चित करने के लिए आत्मा – परमात्मा का योग करिए तभी तो जीवन जी पाओगे आप !

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