
आज प्रसिद्ध सेक्स एजुकेटर Seema Anand जी का शुभंकर मिश्रा द्वारा किया गया पॉडकास्ट देखा। हालांकि शुभकंर कई बार व्यक्तिगत सवालों को पूछते हुए बदतमीजी की हद तक पहुंचते लगे। लेकिन क्या किया जाए, सेक्स पर बात करती हर स्त्री के बेड पर क्या होता है यह जान लेने की जिज्ञासा लोगों में इतनी प्रबल है।
ख़ैर इस वीडियो में सीमा जी के वक्तव्यों से कई महत्वपूर्ण चीजें निकलकर आईं, जिन्हें समझना और जानना बेहद ज़रूरी है।
सीमा आनंद अक्सर अपनी बातचीत में कामसूत्र को कोट करती हैं और मिथकों को तोड़ती चलती हैं। उनका एक केंद्रीय तर्क कामसूत्र को लेकर फैली गलतफहमियों पर है। वे साफ़ करती हैं कि कामसूत्र सिर्फ़ ” सेक्स पोजीशंस” (यौन मुद्राओं) की किताब नहीं है। वह तो केवल एक अध्याय है… कामसूत्र वास्तव में एक सामाजिक ग्रंथ है, जिसमें सेक्स के अलावा 63 अन्य जीवनोपयोगी कलाओं का विस्तृत वर्णन है जैसे घर बनाना, हार बनाना, अलंकरण धारण करना, संदेश पहुंचाना, वस्त्र बनाना, खाना बनाना, सजावट करना… Etc.

सेक्स आधारित संदर्भों में एक बेहद महत्वपूर्ण बात जो कामसूत्र में कही गई वो ये कि आनंद स्त्री और पुरुष दोनों के लिए बराबर ज़रूरी है। अगर स्त्री प्रसन्न और आनंदित रहती है तो इस समस्त ब्रह्मांड और प्रकृति में हार्मनी (सामंजस्य) बनी रहती है। अगर कोई पुरुष स्त्री को प्रसन्न रखता है तो उसे व्यापार में सफलता मिलती है, उसके घर का वातावरण सकारात्मक रहता है।
सीमा आनंद कहती हैं हम अक्सर sex और pleasure को एक ही अर्थ में लेते हैं — लेकिन यह एक आंतरिक भ्रम है। सेक्स एक शारीरिक क्रिया हो सकती है लेकिन आनंद एक मानसिक और भावनात्मक प्रक्रिया है जो हमारे ब्रेन में घटित होती है।
सेक्स कोई भी कर सकता है, लेकिन आनंद तभी संभव है जब व्यक्ति स्वयं को दूसरे के साथ सुरक्षित, प्रिय और सम्मानित महसूस करे।
आनंद के लिए समय चाहिए।
धैर्य चाहिए।
और सबसे ज़्यादा – संवाद चाहिए।
वे क्लियर करती हैं कि सेक्स केवल पेनेट्रेशन की क्रिया नहीं है। कडलिंग, हगिंग, और किसिंग भी सेक्सुअल इंटीमेसी है जो इक्वली प्लेजरेबल और इंपॉर्टेंट हैं। स्किन टू स्किन टच, एक दूसरे की सांसों को अपने बदन पर महसूस करना भी आनंद है जो बेहद सुकून दायक रोल प्ले करता है।

क्या सेक्स के समय पुराने अनुभवों या एक्स के बारे में सोचना नॉर्मल है?
जवाब है — हाँ, यह सामान्य है। जिसे हम भूलना भी चाहें तो भी ब्रेन याद रखता है यह हमारी चेतना का हिस्सा बनी रहती है। एक तरीके से हमारे शरीर की एक यांत्रिक मेमोरी भी होती है।
इसे चीटिंग की तरह न लेकर इसे समझना ज़रूरी है। अगर सेक्स के समय पुराने अनुभव या पुराना पार्टनर याद आता है तो हमेशा इसका मतलब यह नहीं कि आप उसके पास जाना चाहते हैं।
एक बात और, लोग अक्सर सेक्स या किसी पोजीशन के लिए पार्टनर के मना करने पर नाराज हो जाते हैं और इसे एक पनिशमेंट की तरह ले लेते हैं। लेकिन रिश्तों में ‘बाउंड्रीज’ या सीमाएं तय करना कोई सजा नहीं है, बल्कि यह खुद को सुरक्षित महसूस कराने और रिश्ते को स्वस्थ रखने का एक तरीका है।
समाज अक्सर जिन विषयों से असहज होता है, वे विषय सबसे अधिक समझे जाने की माँग करते हैं। सीमा आनंद के विचार इसी असहजता के केंद्र में जाकर खड़े होते हैं। अपनी बातों को कहते हुए वे न तो उत्तेजना पैदा करती हैं, न ही किसी नैतिक ढाँचे को तोड़ने का आग्रह करती हैं। वे केवल यह पूछती हैं कि हमने आनंद को समझने के बजाय उससे डरना क्यों सीख लिया, उसे नियंत्रित क्यों किया जाने लगा?
वे कहती हैं समाज को सेक्स से वास्तविक समस्या कभी नहीं रही। हर समाज, हर युग में सेक्स मौजूद रहा है- छिपकर, खुलकर, वैध-अवैध रूपों में। बच्चे पैदा करने की क्रिया के रूप में तो सेक्स को पवित्र कर्म तक बताया गया, अनुष्ठान के रूप में प्रतिस्थापित किया गया। समस्या तब शुरू होती है जब सेक्स के साथ आनंद जुड़ता है।
आनंद असल में व्यक्ति को सजग बनाता है।
आनंद व्यक्ति को अपने शरीर और मन से जोड़ता है। उसे स्वतंत्र बनाता है आत्म-सचेत बनाता है। वह अपने शरीर, अपनी इच्छाओं और अपनी सीमाओं को पहचानने लगता है।
और जो व्यक्ति खुद से जुड़ जाता है, उसे डराकर नियंत्रित करना कठिन हो जाता है। यह आत्म-सचेत व्यक्ति सामाजिक नियंत्रण की संरचनाओं के लिए चुनौती बन जाता है। इसलिए सत्ता का अमूर्त तंत्र हमेशा व्यक्ति पर परोक्ष प्रतिबंध लगाता है।
(बातें तो कई हैं मल्टीपल पार्टनर, प्री मैरिटल सेक्स, कंसेंट, एक की सेक्सुअल अर्ज बहुत अधिक हो एक की कम तब क्या करें, सब पर लिखने से पोस्ट बहुत बड़ी होती जायेगी।
Roopam Gangwar की फेसबुक वाल से
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