
राजनारायण बुधौलिया बुंदेलखंड का ब्रह्म गौरव, एक युग का नाम||
कभी राठ की मिट्टी में जन्मे, गांव की गलियों में बड़े हुए, और फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे जटिल मैदान में अपनी एक अलग पहचान बनाकर अमिट छाप छोड़ने वाले नाम का परिचय आज किसी सीमित परिभाषा में नहीं समा सकता। राजनारायण बुधौलिया केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की आत्मा में गूंजने वाला लोकस्वर थे।
उन्हें राठ का “दबंग चेहरा” कहा गया, लेकिन यह दबंगई किसी सत्ता या स्वार्थ की नहीं, बल्कि सत्य और समाज की थी।
● सामाजिक चेतना से राजनीति की यात्रा तक
राजनारायण बुधौलिया का जीवन उस परंपरा का प्रतीक है जहाँ राजनीति जनसेवा से जन्म लेती है, न कि पद से।
उनका राजनीतिक सफर किसी पार्टी के टिकट से नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ से शुरू हुआ।
एक समय था जब वे निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राठ विधानसभा क्षेत्र से मैदान में उतरे। हार मिली, पर यह हार एक बीज थी — जिसने आगे चलकर एक वटवृक्ष का रूप लिया।

उन्होंने सपा से लेकर बसपा और अंततः भाजपा तक — तीनों दलों में रहकर समाजहित के कार्य किए। लेकिन हर दल में रहते हुए भी वे दल के नहीं, जनता के प्रतिनिधि रहे। यही कारण था कि उनकी विचारधारा किसी झंडे में नहीं बंधी, बल्कि बुंदेलखंड के हर वर्ग, हर समाज, हर विचारधारा में फैली रही।

● राजनीतिक यात्रा के मील के पत्थर
1995: समाजवादी पार्टी से हमीरपुर-महोबा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा — कठिन संघर्ष, पर हार में भी जनस्वीकृति की सुगंध मिली।
1999: बहुजन समाज पार्टी से चुनावी मैदान में उतरे — राजनीति के समीकरण समझे, जनभावना का रुख पहचाना।
2004: समाजवादी पार्टी से हमीरपुर-महोबा लोकसभा सीट पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। यह केवल एक चुनावी जीत नहीं थी, यह बुंदेलखंड की ब्राह्मण चेतना और जनसंघर्ष की विजयगाथा थी।
2012: बहुजन समाज पार्टी से महोबा सदर विधानसभा से विधायक चुने गए।
राजनारायण बुधौलिया ने यह सिद्ध किया कि व्यक्ति अगर ईमानदार, जुझारू और लोकनिष्ठ हो तो पार्टी उसके पीछे चलती है, व्यक्ति पार्टी के पीछे नहीं।
● राजनीति में ‘ब्राह्म गौरव’ की पुनर्स्थापना
बुंदेलखंड सदियों से वीरता, धर्मनिष्ठा और त्याग का क्षेत्र रहा है। परन्तु सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से एक ऐसा दौर भी आया जब ब्राह्मण समाज आत्मसंकुचित हो गया था। ऐसे समय में राजनारायण बुधौलिया ने “ब्रह्म गौरव” के पुनर्जागरण का कार्य किया।
वे जानते थे कि समाज तभी उठेगा जब उसका बौद्धिक वर्ग सक्रिय हो इसलिए उन्होंने राजनैतिक शक्ति को साधन बनाया, लक्ष्य नहीं। उनकी सभाओं में जाति नहीं, विचार की बात होती थी। उनके लिए ब्राह्म समाज का उत्थान किसी अहंकार की स्थापना नहीं, बल्कि समरसता और सामाजिक संतुलन की दिशा में यात्रा थी।
● राजनारायण का ‘लोकधर्म’ दल से बड़ा समाज
राजनारायण बुधौलिया की सबसे बड़ी ताकत यही थी कि वे कभी ‘दल विशेष’ के नहीं बने। वे सपा में रहे तो भी भाजपा के नेताओं से संबंध अच्छे रहे, वे बसपा में थे तो कांग्रेस के लोगों से संवाद बनाए रखा।
उनके बारे में कहा जाता था —
“वे हर पार्टी में नहीं, हर दिल में थे।”
सभी दलों के मुख्यमंत्री, सांसद, मंत्री उनकी राय का सम्मान करते थे। वे उन नेताओं में से थे जिनकी बात सुनने के लिए न केवल कार्यकर्ता, बल्कि अधिकारी भी तत्पर रहते थे।
● समाजहित में समर्पित जीवन
राजनारायण बुधौलिया ने राजनीति को कभी पेशा नहीं बनाया। उनका घर राठ में हमेशा समाज के हर वर्ग के लिए खुला रहता था। उन्होंने गरीबों की सहायता की, नौजवानों को रोजगार दिलाया, और बुंदेलखंड के विकास के लिए निरंतर संघर्ष किया।
उनके जीवन का एक प्रमुख सूत्र था
“राजनीति का लक्ष्य सत्ता नहीं, समाज का उत्थान है।”
● पारिवारिक विरासत और जनविश्वास
उनके पिता स्व. डॉ. गनेशीलाल बुधौलिया 1988 में राठ नगर पालिका अध्यक्ष चुने गए थे — कांग्रेस से।
यह दिखाता है कि राजनीति उनके परिवार में विरासत नहीं, सेवा का संस्कार थी। राजनारायण बुधौलिया ने उसी परंपरा को आगे बढ़ाया। वर्ष 2017 में उन्होंने अपने छोटे भाई श्रीनिवास बुधौलिया को राठ नगरपालिका का चेयरमैन बनवाकर यह दिखाया कि जनता का विश्वास आज भी उनके परिवार में अक्षुण्ण है।
● जीवित विचार, अमर नाम
10 नवंबर 2025 — यह तिथि बुंदेलखंड के इतिहास में अंकित हो गई, जब पूर्व डिप्टी सीएम डॉ. दिनेश शर्मा ने राठ में राजनारायण बुधौलिया की प्रतिमा का अनावरण किया। उस दिन केवल एक प्रतिमा नहीं, बल्कि एक युग का पुनरागमन हुआ।
हजारों लोग, सभी दलों के नेता, और हर वर्ग के नागरिक यह बताने आए कि विचार मरते नहीं, जो व्यक्ति समाज के लिए जीता है, वह शाश्वत हो जाता है।
● बुंदेलखंड का भविष्य और राजनारायण की दृष्टि
पूर्व डिप्टी सीएम डॉ. दिनेश शर्मा ने प्रतिमा अनावरण के अवसर पर कहा —
“बुंदेलखंड अब उद्योग और युवाशक्ति का केंद्र बनेगा। हर घर को पानी मिलेगा, यही सरकार की गारंटी है।” यह वही स्वप्न था जिसे वर्षों पहले राजनारायण बुधौलिया ने देखा था कि
एक ऐसा बुंदेलखंड जहाँ पलायन नहीं, प्रतिभा प्रवाह करे।
● एक युग, एक संदेश
राजनारायण बुधौलिया के जीवन को एक वाक्य में समेटना हो तो कहा जा सकता है —
“उन्होंने राजनीति को धर्म बनाया और समाजसेवा को साधना।”
उनकी स्मृति केवल मूर्ति में नहीं, बल्कि उन असंख्य दिलों में जीवित है जिन्होंने उनके सान्निध्य में ‘राजनीति’ को ‘लोकनीति’ बनते देखा।
● युगों तक गूंजता रहेगा नाम
कवि के शब्दों में…… “है गुलशन में रिश्ता रंग और बू का,
हमीं हम हैं तो क्या हम हैं, तुम्हीं तुम हो तो क्या तुम हो।”
राजनारायण बुधौलिया अब भौतिक रूप में नहीं हैं, पर वे हर उस विचार में जीवित हैं जो समाज की सेवा के लिए समर्पित है। बुंदेलखंड की रेत में, राठ की हवाओं में, और जनमानस के विश्वास में…….
‘राजनारायण बुधौलिया’ केवल एक नाम नहीं, एक युग हैं।
[ फोर्थ पिलर के संस्थापक आलोक शर्मा महोबा ]








