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“जब सनातन की एकता की बात होती है, तब विरोध की राजनीति शुरू हो जाती है। यह विरोध असल में धर्म नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा के खिलाफ है।”

बागेश्वर धाम की यात्रा के विरोध पर युवाओं ने किया बृहद प्रदर्शन, कहा धर्म पर प्रहार नहीं सहेंगे

महोबा, उत्तर प्रदेश

आज महोबा तहसील प्रांगण उस वक्त धर्म और एकता के प्रतीक स्वर से गूंज उठा, जब सैकड़ों की संख्या में युवा सनातनी संगठनों के झंडे थामे एकजुट हुए। उद्देश्य एक ही बागेश्वर धाम पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की “सनातन एकता यात्रा” के विरोधियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करना।

सदर एस.डी.एम. को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपते हुए युवाओं ने साफ कहा कि “सनातन के कालनेमियों को बख्शा नहीं जाएगा।” ज्ञापन में आरोप लगाया गया कि ग्वालियर निवासी एक व्यक्ति द्वारा पीठाधीश्वर पर लगाए गए झूठे और भड़काऊ आरोप न केवल धर्म पर आघात हैं, बल्कि करोड़ों सनातन अनुयायियों की आस्था को ठेस पहुँचाते हैं।

संगठनों की एकता ने दिया संदेश

इस प्रदर्शन में विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, शिवसेना (शिंदे गुट) सहित जिले के तमाम हिंदू संगठनों ने संयुक्त रूप से भाग लिया। विहिप के विभाग मंत्री मयंक तिवारी के नेतृत्व में सौंपे गए ज्ञापन में कहा गया कि समाज में धार्मिक सौहार्द बिगाड़ने वाले तत्वों पर सख्त कार्रवाई की जाए।

संगठन प्रतिनिधि अवनीश सोनी, सुशील कुमार, धनेंद्र दीक्षित, संजय दीक्षित, आशीष अवस्थी, अमित शर्मा, अमित तिवारी, विनय गोयल और विकास शुक्ला ने एक स्वर में कहा —

“जब सनातन की एकता की बात होती है, तब विरोध की राजनीति शुरू हो जाती है। यह विरोध असल में धर्म नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा के खिलाफ है।”

बागेश्वर धाम की यात्रा और विवाद

धीरेंद्र शास्त्री की “सनातन एकता यात्रा” 7 नवंबर से छतरपुर के कात्यायनी मंदिर से प्रारंभ होकर वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर तक पहुँचेगी।
16 नवंबर को यह यात्रा राष्ट्रीय राजमार्ग मार्ग से पलवल होते हुए वृंदावन पहुँचेगी। यात्रा का उद्देश्य शास्त्रीजी के अनुसार — “सनातन धर्म की रक्षा, हिंदू एकता का प्रसार और राष्ट्र को धर्ममय दिशा देना” है।

किन्तु दूसरी ओर, दलित, ओबीसी और भीम आर्मी जैसे कुछ संगठनों ने इस यात्रा का विरोध करते हुए इसे “विभाजनकारी” करार दिया है। उनका कहना है कि “हिंदू राष्ट्र” का नारा सामाजिक और धार्मिक तनाव बढ़ा सकता है।

धर्म, राजनीति और समाज का संगम

यह विवाद केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश के सामाजिक और वैचारिक विमर्श का विषय बन गया है। जहाँ एक ओर समर्थक इसे “सनातन पुनर्जागरण” की संज्ञा दे रहे हैं, वहीं विरोधी इसे “धर्म के राजनीतिकरण” के रूप में देख रहे हैं।

महोबा के प्रदर्शन ने यह स्पष्ट किया कि छोटे जिलों की धरती पर भी धर्म-संस्कृति के प्रति सजग चेतना जीवित है “धर्म केवल पूजा नहीं, बल्कि समाज की आत्मा है। और जब आत्मा पर चोट होती है, तो जन-जन की आवाज़ एक हो जाती है।”

बागेश्वर धाम की यह यात्रा केवल धार्मिक आस्था का आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय समाज के वर्तमान विमर्श का आईना है। विरोध और समर्थन — दोनों पक्षों का सार एक ही सवाल की ओर इंगित करता है: क्या धर्म आज भी समाज को जोड़ने की शक्ति है, या राजनीति की नई दिशा का उपकरण बन गया है?

महोबा की युवा पीढ़ी ने जिस उत्साह से “सनातन रक्षा” का संकल्प लिया, वह यह दर्शाता है कि आज का युवा भी अपने धर्म, अपनी संस्कृति और अपने राष्ट्र को लेकर सजग है। परंतु, साथ ही समाज को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सनातन का असली अर्थ है — सबका सम्मान, सबका कल्याण।

“विरोध विचारों का हो, व्यक्ति का नहीं; सनातन की रक्षा ज्ञान और एकता से होती है, द्वेष से नहीं।”

( फार्थ पिलर फाउंडर आलोक शर्मा की सत्य भारत के लिए रिपोर्ट )

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