
ऐसा करने से शिक्षण कार्य मे गुणवत्ता आएगी भानूप्रताप
यह एक अच्छी बात है, कि समय समय पर महाविद्यालयों, शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों एवं अन्य प्रशिक्षण संस्थानों जैसे चिकित्सा महाविद्यालयों, बिधि महाविद्यालयों, पॉलिटेक्निक संस्थानों एवं इंजीनियरिंग कॉलेजों आदि का भौतिक एवं स्थानीय सत्यापन विश्वविद्यालयों, राष्ट्रीय शिक्षक प्रशिक्षण काउंसिल (NCTE), भारतीय चिकित्सा परिषद (MCI), बार काउंसिल ऑफ इण्डिया (BCI) एवं तकनीकी शिक्षण विभाग आदि के द्वारा होता रहता है। यह बहुत अच्छी बात है, क्योंकि इसके द्वारा शिक्षण / प्रशिक्षण संस्थानों की कमियां उजागर होती हैं, और संस्थान अपनी कमियों को दूर करके आदर्श संस्थान बनते हैं। वर्तमान समय कुछ इसी प्रकार का समय है।
इस प्रकार के सत्यापन में सामान्य रूप से देखा जाता है, कि सरकारी तथा अर्धसरकारी (सरकारी सहायता प्राप्त संस्थान) संस्थानों में सभी आवश्यक भौतिक संसाधन तो उपलब्ध रहते हैं, किन्तु शिक्षकों / अनुदेशकों की कमी रहती है, जिसके चलते संस्थान को एक वर्ष (एक शैक्षिक सत्र ) या शिक्षक / अनुदेशक नियुक्त होने तक सम्बन्धित कोर्ष की मान्यताएक शैक्षिक सत्र ) या शिक्षक / अनुदेशक नियुक्त होने तक सम्बन्धित कोर्ष की मान्यता स्थगित कर दी जाती है, किन्तु निजी संस्थानों में सभी भौतिक संसाधन एवं आवश्यक मानवीय संसाधन (शिक्षक, अनुदेशक एवं अन्य) की कोई कमी नही रहती, परिणामस्वरूप इन संस्थानों को कोर्ष की मान्यता के साथ-साथ आवश्यक विद्यार्थी / प्रशिक्षु आवंटित कर दिए जाते हैं, वास्तविकता इससे परे होती है।

ऐसे संस्थानों द्वारा विजिटिंग टीम को धोखे में रखकर अथवा उससे साठ – गांठ करके (पैसे देकर या सामाजिक अथवा राजनैतिक दबाव बनाकर ) अपने पक्ष को मजबूती प्रदान की जाती है, कोर्ष की मान्यता बरकरार रखी जाती है।
यह ध्यान रहे कि इस प्रकार के संस्थानों के कागजी कार्य में कोई कमी नहीं दिखती, भले ही वास्तविकता इससे परे हो, जो सामान्य रूप से देखी जाती है। यहां भौतिक संसाधन मसलन विद्यालय भवन, खेल के लिए मैदान आदि मानकों के अनुरूप तो होते हैं, किन्तु एक ही भवन को दिखाकर अलग-अलग कोर्ष की मान्यता ले ली जाती है। प्रयोगशालाएं एवं वर्कशाप कम खुलते हैं, जिससे छात्रों में प्रयोगात्मक ज्ञान एवं कार्यानुभव की कमी बनी रहती है।
ऐसे में ये सत्यापन के समय शिक्षकों एवं अनुदेशकों को विशेष रूप से बुलाकर इनकी कमी पूरी की जाती है। इसके लिए संस्थान द्वारा उन्हें कुछ पैसे दिए जाते हैं। बाद में (सत्यापन के पश्चात) इनकी छुट्टी कर दी जाती है। ऐसे संस्थानों में कुछ ही शिक्षकों द्वारा वर्ष पर्यन्त शिक्षण कार्य किया जाता है एवं इसकी खाना-पूरी की जाती है, साथ ही प्रशिक्षुओं को आन्तरिक मूल्यांकन/इन्टर्नशिप में अच्छे अंक देने का प्रलोभन देकर अथवा इनमें अनुत्तीर्ण करने की बात कहकर शान्त रहने के लिए मजबूर किया जाता है।

छात्र इस प्रकार के कारणों एवं अपने भविष्य में होने वाले सुखद/दुखद व्यवहार की कल्पना करके जो उन्हें उनके संस्थान द्वारा दिए जा सकते हैं, की मानसिक उधेडबुन में अपना शिक्षण/प्रशिक्षण पूरा करता है। ऐसी परिस्थितियों में वह कितना सीखता है ? यह बिचार करने योग्य है।
अधिकांश शिक्षण/प्रशिक्षण संस्थानों द्वारा किया जाने वाला एक और कार्य (व्यवहार) बरवस अपनी ओर आकर्षित करता है, जिसका उल्लेख करना आवश्यक जान पड़ता है। NCTE अथवा अन्य मानीटरिंग संस्थाओं द्वारा प्रशिक्षुओं के लिए कुछ मानक निर्धारित किए जाते हैं, जिन्हे पूरा कराने की जिम्मेदारी संस्थानों के प्रमुखों को दी जाती है।
प्रबंधन तंत्र के दबाव अथवा स्वयंभू संस्थानों के प्राचार्य/एच.ओ.डी. अपने अधिकारों का दुरुपयोग करके अपने चहेतों के उक्त मानक ऐसे ही पूरे कर दिए जाते हैं। एक उदाहरण द्वारा इस निम्नांकित प्रकार से देख सकते हैं “एनसीटीई द्वारा जारी रेगुलेशन के अनुसार B.Ed. के 2 वर्षीय प्रशिक्षण में प्रशिक्षुओं की उपस्थिति 75% से कम नहीं होनी चाहिए, तभी वह परीक्षा में शामिल किया जा सकता है, किंतु प्रशिक्षक संस्थाओं द्वारा चहेतों को इससे पूरी छूट दे दी जाती है, बदले में प्रशिक्षुओं से अतिरिक्त धन वसूली की जाती है।
इस प्रकार की वसूली अधिकांश स्ववित्तपोषित संस्थाओं के साथ-साथ कुछ अनुदानित संस्थाओं के कर्मचारियों / अधिकारियों द्वारा की जाती है, और प्रशिक्षु प्रशिक्षण से गायब गायब रहते हैं।
ऐसी परिस्थितियों पर प्रशिक्षण कितना प्रभावी होगा ? इसका अनुमान लगाया जा सकता है। इस प्रकार से प्रशिक्षण प्राप्त करने वाला प्रशिक्षु, प्रशिक्षण के पश्चात शिक्षण कार्य के प्रति कितना समर्पित एवं उत्तरदाई होगा ? यह प्रश्न विचारणीय है।
यह तो केवल एक उदाहरण मात्र है, स्थितियां तो इससे भी भयावह हैं। ठीक इसी प्रकार डी.एल.एड.(बीटीसी) एन.टी.टी, आई.टी.आई. आदि प्रशिक्षण संस्थानों में भी देखने को मिलती है, जहां प्रशिक्षण के नाम पर पैसों का लेनदेन होता है।
ऐसे संस्थानों के प्रशिक्षकों /अनुदेशकों की स्थिति भी कुछ इसी तरह की होती है। उच्च शिक्षा प्राप्त प्रशिक्षित एवं नेट अथवा पीएचडी किए हुए इन प्रशिक्षकों को संस्थाओं द्वारा दस – बारह हजार रुपए बातौर मानदेय (वेतन) प्रतिमाह दिए जाते हैं, और कैश बुक में पैंतीस / चालीस हजार प्रति माह दर्शाया जाता है। ऐसे में यदि प्रशिक्षक इस कार्य का विरोध करता है, तो उसे संस्थान से निकाल देने की बात कही जाती है। अतः मरता क्या ना करता की तर्ज पर प्रशिक्षक अपना कार्य आधे – अधूरे मन से करता रहता है। ऐसे में प्रशिक्षण की गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
ऐसे अधिकांश संस्थानों में प्रशिक्षकों की नियुक्ति तो मानकों के अनुसार होती है किंतु वास्तविक उपस्थित दो तीन प्रशिक्षकों तक की सीमित रहती है, जिन्हें मासिक वेतन दस / बारह हजार रुपए प्रतिमाएं दिए जाते हैं, बांकी सभी अनुमोदित प्रशिक्षकों की पेमेंट सीट बनती है और कैशबुक में पेमेंट हो जाता है।
संस्थाओं के इस प्रकार की जानकारी सरकार को पता लगने पर नियमों में परिवर्तन करके प्रत्येक शिक्षक / प्रशिक्षक का मानदेय (वेतन) उसके स्वयं के बैंक खाते में दिया जाने लगा। किंतु यहां भी खेल होता है, इसके लिए शिक्षक / प्रशिक्षक का बैंक खाता खुलवाया जाता है किंतु उसका एटीएम कार्ड व चेकबुक (हस्ताक्षर की हुई ) लेकर संस्थान द्वारा रख ली जाती है, तथा खाते में पेमेंट करके उसे संस्थान द्वारा ही निकाल लिया जाता है।
इसी प्रकार अन्य स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों में भी होता पाया जाता है। जहां विश्वविद्यालय के मानकों के अनुसार प्रशिक्षित सहायक प्रोफेसर का अनुमोदन होता है किंतु वास्तव में शिक्षण करने वाले सहायक प्रोफेसर मानकों से कम संख्या में एवं कम शिक्षित होते हैं। ऐसे में शिक्षण एवं शिक्षा का स्तर नीचे गिरता है, तो कोई आश्चर्य नहीं।
ऐसे में शिक्षा के स्तर (खासकर उच्च शिक्षा) की उचित दशा दिशा बनाए रखने की जिम्मेदारी हम सबकी बनती हैं, क्योंकि यह एक सामाजिक क्रिया है। इसमें समाज एवं राष्ट्र का हित सन्निहित होता है।
अतः इसे पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ संपन्न करना चाहिए। इसके लिए जिम्मेदार लोगों को अपनी-अपनी जिम्मेदारी का पूर्ण मनोयोग से पालन करना चाहिए। अपने – अपने कार्यों मैं गुणवत्ता लानी चाहिए। ऐसे में मॉनीटरिंग संस्थाओं / कार्यकारी अधिकारियों को चाहिए कि वह औचक निरीक्षक करें एवं लापरवाह कार्मिकों एवं संस्थानों पर तत्काल उचित दंडात्मक कार्यवाही करें। समय-समय पर विश्वविद्यालयों को अपने अधीनस्थ महाविद्यालय एवं शैक्षणिक गतिविधियों का निरीक्षण एवं मॉनिटरिंग करते रहना चाहिए।
यदि विश्वविद्यालय के अधिकारी चाह लें तो औचक / आकस्मिक निरीक्षणों एवं तदानुसार आवश्यक कार्यवाही द्वारा इस प्रक्रिया में आवश्यक सुधार लाया जा सकता है। इसमें विश्वविद्यालय द्वारा अध्यापकों के अनुमोदन एवं नियुक्ति की प्रक्रिया में आवश्यक बदलाव करके प्राध्यापकों की नियुक्ति संयुक्त रूप से विश्वविद्यालय स्तर से की जा सकती है, ऐसा करने से महाविद्यालय को योग्य प्राध्यापक मिलेंगे एवं इस संबंध में उनकी चिंता / परेशानी दूर होगी। ऐसा करने से शिक्षण कार्य में भी गुणवत्ता आएगी।
इस दिशा में प्राध्यापको एवं महाविद्यालयों के हित में विश्वविद्यालय एक और कार्य कर सकते हैं क्योंकि महाविद्यालयों के प्राध्यापक सम्बन्धित विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त एवं अनुमोदित होते हैं अतः विश्वविद्यालय इन प्राध्यापकों के मानदेय की राशि अपने पास रख लें, तथा उपस्थित एवं कार्य का सत्यापन करके प्राध्यापकों का मानदेय प्रतिमाह उनके बैंक खाते में देते रहें। इससे प्राध्यापकों पर वृत्तिक दबाव कम होगा एवं वे शिक्षण कार्य में अधिक ध्यान देंगे। इस कार्य से विश्वविद्यालय का शैक्षणिक स्तर भी बढ़ेगा एवं देश को अच्छे कर्मचारी तथा अधिकारी एवं व्यवसायी प्राप्त होंगे।
इस लेख का उद्देश्य किसी संस्थान, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय या व्यक्ति विशेष की कमी निकालना नहीं है।
भानु प्रताप बाजपेयी
MSc,BEd,MA(Ed)NET
शोधार्थी, JRDSU चित्रकूट








