@Saurabh Dwivedi
संजय को दिव्य दृष्टि प्राप्त थी। वह अंधे धृतराष्ट्र को कुरूक्षेत्र के मैदान का सारा हाल बता रहा था। माया के अंधकार और अहंकार मे धृतराष्ट्र कभी प्रसन्न होता और कभी दुखी होता। पांडवो की हल्की शिकस्त उसकी खुशी बन जाती और कौरवों के महारथी का वध होते ही वह कांपने लगता।
मैं संजय की तरह था। कानपुर का मैदान था। सड़क के किनारे फुटपाथ का मैदान जहाँ एक कुतिया साधारण सी जीव मगर फुर्तीली जीव गिलहरी पर हमलावर हो रही थी। कुतिया गिलहरी का पीछा कर रही थी और गिलहरी उतनी ही तेजी से भाग रही थी , सचमुच जान बचाने के लिए हम जितना भाग सकते हैं। जितना प्रयास हम स्वयं की जिंदगी के लिए कर सकते हैं।
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यकीनन जब जीवन अंधकार मे नजर आता है तब हम कितना प्रयास करते हैं। हर तरह का प्रयास जीवन मे खुशियों का और प्रेम का प्रकाश लाने के लिए करते हैं। मगर जीवन कोई एक कमरा नहीं जिसमे अंधकार हो तो बल्ब जला दो और प्रकाश से भर जाएगा। यहाँ की माया मे अक्सर हम धृतराष्ट्र ही हो जाते हैं , अपनी ही जीत – हार की खुशी और गम मे जीवन व्यतीत करते हैं।
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ऐसे ही वो गिलहरी अपनी तेज गति मे दौड़ती हुई केला का ठेला के नीचे पहुंच चुकी थी परंतु वह कुतिया भी उतनी ही तेजी से नीचे झुकी और शिकार करने कोशिश की !
मैं चित्रकूट से कानपुर क्यों पहुंचा था ? मूकदर्शक बनने के लिए ? नहीं ! मैं यहाँ संजय की तरह सिर्फ कुरूक्षेत्र की कहानी नहीं सुना रहा , ना मेरे पास कोई दिव्य दृष्टि है। साधारण इंसान और मर्म चक्षुओं से जो कुछ मैनें देखा उसमे मुझे शिकारी कुतिया से गिलहरी की जान बचाने का कोई ब्रह्मांडिय संकेत मिल चुका था। मेरे मन मे उतनी ही तीव्र तरंग आई और कुतिया उसे दबोचती उससे पहले मैंने ऐसा बीच – बचाव कर दिया कि गिलहरी मेरी नजरों से भी दूर कहीं ओझल हो गई।
अब मैं देखता हूँ कि कुतिया निराश होकर वापस होने लगी। मैं पुनः अपने आप मे आ चुका था। सोचने लगा कि चलो आज एक जिंदगी बचा ली। मैने कोई पुण्य का काम कर लिया। मैने ईश्वर को भी धन्यवाद दिया कि आज मुझे किसी पाप कर्म से छुटकारा दिलाने के लिए गिलहरी की जान बचाने के लिए आपने निमित्त बनाया। इससे पहले यह भी सच है कि कर्ता का भाव हमारे मन मे आने लगता है किन्तु सचमुच हम निमित्त मात्र होते हैं।
ऐसा इसलिए कि पल भर में कहानी बदल चुकी थी। पलक झपकते ही कहानी मे नया मोड़ आ गया था। गिलहरी बचा लेने का पुण्य सुख मेरे अंदर ज्यादा देर तक ठहर नहीं सका।
मैं देखता हूँ कि गिलहरी काफी दूर एक चार पहिया बड़े इनवर्टर के नीचे थी और शिकारन कुतिया भी गिलहरी के पास दौड़कर पहुंच चुकी थी। मतलब साफ है कि पल भर मे पुनः जीवन मृत्यु बन चुका था। यह सबकुछ मेरी नजरों के सामने घटित हुआ शिकारन कुतिया एक नन्ही सी जान गिलहरी को मुंह मे दबाकर ले जा रही थी।
अब साफ हो चुका था कि गिलहरी कि मृत्यु जो कुछ पल भर पहले नहीं हुई वो अगले पल ही हो गई। हम सोचते हैं हमने ये कर दिया , वो कर दिया और क्या वास्तव मे सबकुछ हम ही करते हैं ? कोई और कर्त्ता है ! ये जन्म ये मृत्यु और जीवन मे माया के कुरूक्षेत्र मे शिकारी कुतिया और गिलहरी जैसी घटना कितनी घटित होती हैं।
हम अपने जीवन मे गिलहरी प्रयास की खूब बड़ी लाइन कहते रहते हैं और मैंने अपने जीवन मे गिलहरी का प्रयास भी देखा और उसकी मृत्यु होते हुए भी देखा। यही सब हमारे दुख – दर्द और बेचैनी आदि का कारण है जो हम जीवन के कुरूक्षेत्र मे गिलहरी ( जिंदगी ) और शिकारन कुतिया (माया ) के युद्ध को नहीं देख समझ सकते हैं।