
अब राजनीतिक कार्य करने का बहुत कम मन करता है या यूं कहें कि नेता नगरी से मन टूट सा गया है ; फिलहाल आप जो फोटो देख रहे हैं यह चित्रकूट जंगल मे देवरहा बाबा मचान आश्रम के संत की है जो कहते हैं कि राम नाम के सहारे रहता हूँ और जूता मुझे नही चाहिए।
पन्नी के सहारे कपड़ा बांधकर आप ठंड से अपना बचाव कर रहे हैं मैने कहा कि मैं इतना तो कर सकता हूँ कि जूता – मोजा खरीदकर ला सकता हूँ तो आप बोले कि मैं क्यों किसी को तकलीफ दूं !
इन दिनों मैं जल जंगल जमीन और सनातन के मर्म को जानने की यात्रा मे हूँ और मुझे बहुत सुकून भी मिलता है। मैने जिस सुख का अनुभव संत यात्रा मे किया है वो मुझे नेता नगरी और कथित सोशल वर्क मे कभी नही मिला।

मैने जब भी जीने को सोचा तो सिर्फ इसलिए कि जीवन मे कुछ बड़ा करना है इसलिए जीना है जब कोई मकसद पूरा होता नही दिख रहा था तब भी यही सोचा था कि करना है कुछ बड़ा काम और एक दिन जीवन सत्य संत सनातन की यात्रा की ओर चल पड़ा जहाँ नित रोज नए अनुभव हो रहे हैं जैसे कि संत समाज से ऐसी घटनाएं घटित हो रही हैं कि खूब किस्से मिल रहे हैं जो संत कृपा से समय-समय पर मेरी वाणी से कहे जाएंगे।
अब तो जीने की खास वजह भी है और निज जीवन मे प्रेम अहसास आनंद की अनुभूति हुई है , इसलिए नेता नगरी के कार्य को सीमित कर संत समाज के माध्यम से वास्तविक जन जागरण लाने कुरूक्षेत्र के अर्जुन की तरह श्रीकृष्ण से ज्ञान लेना और युद्ध मे डटे रहना एक उद्देश्य बन गया।
लोग भी नेता नगरी की नकारात्मक राजनीति और घृणा भाव को महसूस करने लगे हैं , लोग यह जानने लगे हैं कि मुगल हों या अंग्रेज उन्होंने क्या विघटन किया होगा जितना भारतीय सफेदपोश नेताओं ने विघटन पैदा कर सत्ता पानी चाही है तो अगर इस देश धर्म को कोई बचाएगा तो आज का हर एक तपस्वी संत और जो बचना चाहते हैं वे सत्संग से ज्ञान अर्जन कर स्वयं के जीवन को सुखानुभूति से भर लेंगे क्योंकि बड़ा सवाल यही है कि जन्म किसलिए हुआ है ? यह जानकर जीवन को जीना चाहिए और अंत तो सबको पता है कि कोई कुछ भी हो जाए एक दिन मुक्तिधाम तक देह पहुंचनी है तो इससे पहले पूरी मानवता को बचा लें और जिंदगी सरलता से जी सकें , वह नर हो या नारी जीवन जीने की समानता होनी चाहिए और अर्थ का आभास होना चाहिए।








